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जब मनुष्य का बुरा वक्त आता है, तभी उसे धर्म की याद आती है

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गलत काम करने से लोगों को कुछ समय के लिए सुख मिल जाता है. लेकिन एक समय ऐसा भी आता है, जब उसे अपने बुरे कर्मों का फल भोगना पड़ता है. जब व्यक्ति बुरी परिस्थितियों में फंसता है, तभी उसे सही-गलत और धर्म-कर्म की याद आती है. महाभारत में एक ऐसी ही कथा बताई गई है. 

कथा के अनुसार, महाभारत का युद्ध चल रहा था. पांडवों ने कौरव सेना के कई महारथियों को मार दिया था. जब अर्जुन और कर्ण का आमना सामना हुआ तो दोनों के बीच घमासान युद्ध चला. इसी दौरान कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया. कर्ण जब रथ का पहिया निकालने उतरा तो उस समय अर्जुन ने अपने धनुष पर बाण चढ़ा रखा था.

कर्ण ने अर्जुन से कहा- तुम यह क्या कर रहे हो. एक कायर की तरह कर्म मत करो, एक निहत्थे योद्धा पर बाढ़ चलाना तुम्हें शोभा नहीं देता. मुझे रथ का पहिया निकालने दो. फिर मैं तुमसे युद्ध करूंगा. लेकिन अर्जुन के सारथी भगवान श्री कृष्ण ने कहा- जब भी कोई व्यक्ति पर मुश्किल में फंसता है उसे तभी धर्म की याद आती है. आज कर्ण की स्थिति भी ऐसी ही है. जब द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था. जब द्युत क्रीड़ा में कपट हो रहा था. तब कर्ण ने धर्म का साथ नहीं दिया. 16 साल के अकेले अभिमन्यु को इन लोगों ने एक साथ मिलकर मार डाला. यह भी अधर्म था. उस समय कर्ण का धर्म कहां था. 

श्री कृष्ण की बातें सुनकर कर्ण निराश हो गया. श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा- तुम मत रखो और बाढ़ चलाओ. जिसने हमेशा अधर्म का साथ दिया, उसे धर्म की बात करने का अधिकार नहीं. श्री कृष्ण की बात मानकर अर्जुन ने कर्ण पर चला दिया और वह मारा गया.

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