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तिब्बत जीतने वाले राजा जोरावर सिंह, जिनकी सल्तनत में था चीन का शिनजियांग और पाकिस्‍तान का खैबर पख्‍तूनख्‍वां

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आपने जम्मू कश्मीर और लद्दाख से जुड़ी कई कहानियां सुनी होंगी. इनमें से एक कहानी राजा जोरावर सिंह कहलुरिया की भी है जिनके बारे में शायद आपको पता नहीं होगा. राजा जोरावर को पूरब का नेपोलियन कहा जाता था. वह भारत के उन सुर वीरों में शामिल हैं जिनकी वजह से आज लद्दाख देश की सीमा में है.

राजा जोरावर को आज तक रणनीति का कुशल जानकार माना जाता है. उन्हें उनके दुश्मन भी शेर बुलाया करते थे. राजा जोरावर डोंगरा राजशाही के महाराज गुलाब सिंह की फौज का हिस्सा थे. उनका सफर सेनापति के रूप में शुरू हुआ. लेकिन देखते ही देखते वह सेना के जनरल बन गए.

राजा जोरावर ने 180 साल पहले तिब्बत में माउंट कैलाश पर कदम रखा था. उन्होंने मानसरोवर झील में डुबकी भी लगाई थी. तिब्बत से सटी भारत की सीमा हो या फिर चीन का शिनजियांग प्रांत, अफगानिस्‍तान का वाखान कॉरिडोर हो या फिर पाकिस्‍तान का खैबर पख्‍तूनख्‍वां प्रांत, राजा जोरावर सिंह के एकछत्र राज्य थे.

राजा जोरावर का जन्म 15 अप्रैल 1784 को हिमाचल प्रदेश में हुआ था. उन्होंने संपत्ति विवाद के चलते अपना गांव छोड़ दिया. वह हरिद्वार आकर बस गए, जहां उन्हें राणा जसवंत सिंह की रियासत में काम करने का मौका मिला. उन्हें एक सैनिक के तौर पर ट्रेनिंग मिली. 

1817 में जोरावर सिंह को गुलाब सिंह के साम्राज्‍य में जगह मिली. महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने 1808 में जम्‍मू को जीत लिया था. इसके बाद गुलाब सिंह को उनकी तरफ से रियासी की जागीर सौंपी गई थी. जोरावर सिंह यहीं से एक सैनिक के तौर पर आगे बढ़ते गए. 1822 में जब रणजीत सिंह ने गुलाब सिंह को राजा मान लिया तो इसका फायदा जोरावर सिंह को भी हुआ.

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