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आखिर क्या है 64 साल पुरानी ट्रेन नंबर 653 की कहानी, जो आज भी खड़े कर देती है लोगों के रोंगटे

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अगर आप रामेश्वरम से रामसेतु गए हो तो रास्ते में आपने खंडहर देखे होंगे. एक समय तमिलनाडु की धनुषकोडी नाम की जगह काफी समृद्ध थी. लेकिन आज इसे भूतहा शहर के नाम से जाना जाता है. इसके पीछे की कहानी भी काफी हैरान करने वाली है. 15 दिसंबर 1964 को मौसम वैज्ञानिकों ने साउथ अंडमान में बन रहे एक भयंकर तूफान की चेतावनी दी थी और उनकी यह भविष्यवाणी बिल्कुल सच साबित हुई. 

यहां मौसम इतना खराब हो गया और तेज तूफान के साथ बारिश हुई. 21 दिसंबर तक तूफान ने विकराल रूप धारण कर लिया. इस दौरान तमिलनाडु के पांबन आइलैंड से तूफान टकराया और वेस्ट नॉर्थ वेस्ट की तरफ 280 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ने लगा. इस वजह से लोगों में हाहाकार मच गया.

22 दिसंबर रात 9 बजे पांबन से धनुषकोडी तक चलने वाली पैसेंजर ट्रेन यात्रियों के साथ धनुषकोडी रेलवे स्टेशन आ रही थी. ट्रेन नंबर 653 धनुषकोडी रेलवे स्टेशन पर पहुंचने वाली थी, लेकिन तूफान के कारण पायलट ने ट्रेन धनुष्कोड़ी स्टेशन से कुछ दूरी पर रोक दी. काफी देर तक जब पायलट को कोई सिग्नल नहीं मिला तो उन्होंने ट्रेन को चालू कर दिया.

ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और लेकिन समुद्र की लहरें तेजी से उठ रही थी. लहरें इतनी तेज हो गई कि 100 यात्रियों और 5 रेलवे कर्मचारियों समेत कुल 105 लोग समंदर की गहराई में समा गए. उस समय मरने वाले यात्रियों की संख्या 180 से 200 के बीच बताई जाती है. इसके बाद धनुषकोडी रेलवे स्टेशन का नामोनिशान मिट गया. उस चक्रवर्ती तूफान की वजह से उस समय 1500 से 2000 लोगों की मौत हुई थी.

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