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एक विद्वान संत गांव के बाहर अपनी कुटिया में रहते थे, जो कुछ भी उन्हें दान में मिलता उससे उनके खाने-पीने का इंतजाम हो जाता, एक गांव के बाजार में पहुंचे तो

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प्राचीन काल में एक विद्वान संत थे, जो गांव के बाहर कुटिया बनाकर रहते थे. उन्हें जो दान मिलता उसके उनके खाने-पीने का इंतजाम हो जाता है. 1 दिन गांव के बाजार में संत जब पहुंचे तो उन्होंने एक दुकान में खजूर की बहुत सारी टोकरियां देखी. खजूर देखकर उनकी खाने की इच्छा हुई. लेकिन उनके पास पैसे नहीं थे. इसीलिए वह अधूरी इच्छा के साथ कुटिया लौट आए. लेकिन उनका ध्यान खजूर में ही लगा हुआ था. वह उस दिन पूजा-पाठ भी नहीं कर सके और रात को ढंग से सो भी नहीं पाए.


जब वह सुबह उठे तो उन्होंने सोचा कि आज खजूर खाना है. इसीलिए वह पैसे कमाने के लिए जंगल में लकड़ियां लेने पहुंचे. उन्होंने बहुत सारी लकड़ियां इकट्ठी कर ली, जिसे बेचकर वह खजूर खरीद सकते थे. वह लकड़ियां उठाकर बाजार की तरफ चल दिए. कुछ समय बाद संत बाजार पहुंचे और उन्होंने लकड़ी बेच दी और उससे मिले पैसों से खजूर खरीद लिए.
संत खजूर लेकर अपनी कुटिया की ओर चल दिए. उन्होंने रास्ते में सोचा कि आज मेरी खजूर खाने की इच्छा हुई है, कल अच्छे कपड़े पहनने की इच्छा हो सकती है और फिर किसी दिन अच्छे घर की इच्छा हो जाएगी. ऐसे तो मैं इच्छाओं का गुलाम हो जाऊंगा. मुझे भक्ति करनी है. अगर मैं अपनी इच्छाओं को पूरी करने में लगा रहूंगा तो मैं कैसे ध्यान करूंगा. यह सोचकर संत ने अपने खजूर किसी गरीब व्यक्ति को दान कर दिए और कुटिया में आकर ध्यान में बैठ गए.
कहानी की सीख
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हम एक इच्छा को पूरा करने में लगे रहेंगे तो जीवन में कभी शांति नहीं रहेगी. इसीलिए इच्छाओं को सोच-समझकर पूरा करना चाहिए.

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