Nov 7, 2023, 16:30 IST

आखिर कुंती ने श्री कृष्ण से वरदान में दुख क्यों मांगे थे, महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद श्रीकृष्ण ने निर्णय लिया........

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महाभारत का युद्ध समाप्त खत्म हो गया था। पांडव जीत गए थे और युधिष्ठिर राजा बन चुके थे। जब पांडवों के परिवार में सब ठीक हो गया तो श्रीकृष्ण ने निर्णय लिया कि अब मुझे द्वारिका लौट जाना चाहिए। श्रीकृष्ण ने पांडवों को ये बात बताई तो सभी दुखी हो गए, लेकिन श्रीकृष्ण द्वारिका लौटने का निर्णय ले चुके थे। सारी तैयारियां हो गईं। श्रीकृष्ण रथ पर चढ़े और आगे बढ़ने लगे, उस समय कुंती उनके सामने खड़ी हो गईं।

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श्रीकृष्ण अपनी बुआ यानी कुंती को देखकर रुके और रथ से उतरकर उनके पास पहुंचे। श्रीकृष्ण प्रणाम करते, उससे पहले कुंती ने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया।
श्रीकृष्ण बोले कि आप मेरी बुआ हैं, मुझसे बड़ी हैं, माता की तरह हैं। मुझे प्रणाम करना चाहिए, लेकिन आप मुझे क्यों प्रणाम कर रही हैं?
कुंती ने कहा कि कृष्ण मैं जानती हूं कि तुम भगवान हो। अब मैं चाहती हूं कि मैं तुम्हारी भक्ति करूं। तुम जा रहे हो तो मुझे भक्ति करने दो।
श्रीकृष्ण बोले कि ठीक आप मुझे भगवान कह रही हैं तो आप मुझसे कुछ कुछ मांग लीजिए।
कुंती ने कहा कि मुझे तुम वरदान में दुख दे दो।
ये सुनकर श्रीकृष्ण हैरान हुए और बोले कि आपके जीवन में तो वैसे ही कभी सुख नहीं आया है और आप फिर से दुख ही मांग रही हैं, ऐसा क्यों?
कुंती बोली कि जब जीवन में आता है तो तुम याद आते हो, मन तुम्हारी भक्ति में लग रहता है। सुख रहेगा तो मन भक्ति से हट जाएगा, इसलिए तुम मुझे दुख दे दो।
प्रसंग की सीख
इस प्रसंग की सीख यह है कि हमारे जीवन में सुख-दुख का आना-जाना लगा रहता है। हमें हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। दुख के दिनों में भक्ति करेंगे तो मन मजबूत रहेगा और दुखों से लड़ने का साहस बना रहेगा, निराशा हावी नहीं होगी।

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